Wednesday, August 23, 2006

देव वाणी

एक कतरा खून का
मत समझो केवल खून है
जीवन है यह मेरा
जो हो रहा मुझसे दूर है।

एक बूँद पसीने की
मत समझो केवल पानी है
मेहनत है यह मेरी
जिसमे निचुड़ी मेरी जवानी है।

होठों से निकले इन शब्दों को
मत समझो केवल कहानी है
संसार का अनन्त सत्य है यह
यही तो देववणी है।
                  -- Udipta Gupta

Monday, July 10, 2006

हुँकार

ऐ देव तुने क्या सोचा
हो जाएँगे हम नत तेरे समक्ष
नहीं जीत सके तुझसे तो क्या
मानेंगे नहीं हार हम ।

तू करता रहे अपनी मनमानी
और हम तेरी पूजा करें,
तू रुलाए हमें खून के आँसू
और हम तेरा गुणगान करें ।

जो कुछ जीवन में हमें है मिला
वो हमारा अपना पुरुषार्थ है,
पर जो कुछ तू छीन है लेता
वह केवल तेरा अपना स्वार्थ है ।

हमें जो मिला है मानव जीवन
हम लड़ने की शक्ती रखते हैं,
सौ बार गिर कर भी
उठने की हिम्मत रखते हैं ।

हमारे जीवन के पथ पर
तू जहाँ भी काँटे बिछाता है
उसे पार करके आगे
ये मानव ही बढ़ पाता है ।

अंतिम क्षण तक लड़ने का सामर्थ्य
अकेले मानव ही रख पाता है
हार की डर से तुझ जैसा कायर
पीठ दिखाकर भाग जाता है ।

विष निकला जब सागर से
तूने किया भोलेनाथ का आहवान
निकला जब सागर से अमृत तो
अकेले किया तुने उसका पान ।

शर्मोहया तो नहीं है तुझमे
न है अपने कर्त्तव्यों का ज्ञान
स्वर्ग में बने रहने की खातिर
हर लेता है जिस-तिस के प्राण ।

भरने दे तेरे पापों का घड़ा
उस दिन लेंगे हम तेरी खबर
माँगेगा तू अगर मौत भी हमसे
नहीं मिलेगी वो भी तुझको पर ।

तू क्या तेरी औकात है क्या
जो तू हमसे टकराने आया है
तुझ जैसे कई इन्द्रों को हमने
स्वर्ग से लाखों बार हटाया है ।
                                        -- उदिप्त गुप्ता