Friday, December 31, 2010

जीवन-यात्रा

क्या सोच रहा तू आज है,
गुज़र रहा एक पड़ाव है,
छुट रही है ये दुनिया अगर,
दुसरे के खुल रहे द्वार हैं |

क्या आगे है यह ज्ञात नहीं
जो गुज़र गया वो याद सही,
कोई फिर मिल जायेगा
सफ़र साथ कट जायेगा |

जीवन के इस दरिया में
ठराव ज़रा मुश्किल है
जो रुक गया वह मृत
चलता रहा वही जीवित है|

Thursday, April 16, 2009

जोड़ घटाव

कहीं कुछ जुडा
कहीं कुछ घट गया
न ही कुछ बढ़ा
न कुछ सिमट गया
जो नहीं था मेरा मैंने दे दिया
जो मिला नहीं वो ले लिया
जब कुछ गया नहीं तो तू दुखी क्यों है
सब खो कर भी इतनी ख़ुशी क्यों है
यह जोड़ घटाव का ऐसा फेरा है
कहीं रात में भी धुप
तो कहीं दिन में भी अँधेरा है