Monday, June 05, 2006

मन की व्यथा

मन की व्यथा
कभी आँखों से आँसू बनकर बहती है
और कभी यही व्यथा
आँखों से अँगारे बन बरसती है।

आँखों के आँसू देख
तू मुँह फ़ेर चला जाता है
पर इन्ही आँखों के अँगारों से
सँसार समस्त जल जाता है।

आँखों के आँसू कमज़ोरी
और अँगारे क्या जोश-जवानी हैं
इन्सान तू भूल है जाता
दोनों व्यथा की ही निशानी हैं।
           -Udipta Gupta

Thursday, May 11, 2006

कलयुग की कविता

हे कृष्ण तू इस कलयुग में आ कर तो दिखा

तूने 18 साल की उम्र मे मामा कँस को मारा
बिन लादेन को हाथ लगा कर तो दिखा

तूने अर्जुन को सारी गीता सुनाई
मेरे project manager से एक बार बात करके तो दिखा

तूने अर्जुन का सारथी बनकर पाण्डवों को जिताया
Indian cricket team का coach बनकर World Cup जिता करके तो दिखा

तूने भरी मेहफ़िल में द्रौपदी को साड़ी पहनाई
मल्लिका शेरावत को दो-जोड़ी कपड़े पहना कर तो दिखा

तूने गोकुल की 1600 गोपीयाँ पटाईं
मेरी company की सिर्फ़ एक लड़की को पटा कर दिखा

हे कृष्ण तू इस कलयुग में आ कर तो दिखा